सरायकेला-खरसावां: चांडिल सुवर्णरेखा बहुउद्देशीय परियोजना के चांडिल डैम का जलस्तर शुक्रवार रात 9 बजे एक बार फिर 181.02 मीटर आरएल पर पहुंच गया। दिनभर पानी छोड़ने के बावजूद जलाशय में पानी की आवक जारी रही, जिसके बाद रात में डिस्चार्ज बढ़ाना पड़ा।विभागीय जानकारी के अनुसार डैम के 13 रेडियल गेट खोले गए हैं। इसमें 4 गेट 2.5 मीटर, 5 गेट 2 मीटर और 4 गेट 25 सेंटीमीटर तक खोले गए हैं। रात में 260 क्यूमेक्स अतिरिक्त बढ़ाकर कुल 2020 क्यूमेक्स पानी सुवर्णरेखा नदी में छोड़ा जा रहा है।जलस्तर 181 मीटर पार होते ही ईचागढ़ विधानसभा के नीमडीह, कुकड़ू, चांडिल और ईचागढ़ प्रखंड के 40 से अधिक गांवों के निचले खेतों में पानी घुस गया है। धान की खड़ी फसल और सब्जी डूबने से किसानों में भारी चिंता है।*सूचना व्यवस्था पर सवाल, ग्राउंड रिपोर्ट को नजरअंदाज करने का आरोप*चांडिल प्रखंड प्रमुख रामकृष्ण महतो और विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के अध्यक्ष राकेश रंजन महतो ने संयुक्त रूप से सवाल उठाया है।राकेश रंजन महतो ने कहा कि जिला प्रशासन खरकाई नदी और गांजिया बराज के जलस्तर की जानकारी प्रतिदिन सोशल मीडिया पर सार्वजनिक करता है, लेकिन चांडिल डैम के जलस्तर, गेट और डिस्चार्ज की नियमित जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती। विभाग 25 किमी दूर पातकुम और खोकरो पुल के सेंसर से आकलन करता है, जबकि खेत में पानी कहां तक पहुंचा है, इसकी असली जानकारी ग्रामीणों से ही मिल सकती है।*”मैं खुद विस्थापित हूं, इसलिए दर्द समझता हूं” – प्रमुख*प्रखंड प्रमुख रामकृष्ण महतो ने कहा कि वे स्वयं विस्थापित परिवार से हैं। उन्होंने कहा, “डैम का निर्माण 1980-82 में शुरू हुआ, 44 साल बाद भी पूरा नहीं हुआ। बैठक में तय हुआ था कि पानी 180 मीटर से ऊपर नहीं जाएगा, लेकिन आज 181 मीटर पार कर गया।”उन्होंने कहा कि किसानों का धान, सब्जी और उपजाऊ जमीन डूब रही है और शिकायत करने पर विभाग कहता है कि जमीन एक्वायर हो चुकी है। उन्होंने झारखंड सरकार से डूबे धान का मुआवजा देने की मांग की।उन्होंने आरोप लगाया कि डैम का उद्देश्य सिर्फ टाटा, नीलांचल सहित कंपनियों को पानी देना रह गया है। विस्थापितों के पुनर्वास के लिए करोड़ों का फंड आता है पर धरातल पर कुछ नहीं दिखता। जल्द ही ईचागढ़ विधानसभा के सभी जनप्रतिनिधि राज्यपाल से मिलकर ज्ञापन सौंपेंगे।

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