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44 साल बाद भी शहीद के परिवार को सरकारी नौकरी का इंतजार, आखिर कब जागेगी सरकार?

Tiruldih Goli Kand ke Shaheed Dhananjay Mahto ke parivar ko 44 saal baad bhi naukri ka intezar hai.

चांडिल, सरायकेला-खरसावां। झारखंड आंदोलन के इतिहास में 21 अक्टूबर 1982 का तिरुलडीह गोलीकांड आज भी संघर्ष और बलिदान की याद दिलाता है। इस घटना में अजीत महतो और धनंजय महतो शहीद हो गए थे। लेकिन विडंबना है कि शहादत के 44 साल बाद भी शहीद धनंजय महतो के परिवार को सरकारी नौकरी देने का वादा पूरा होने का इंतजार है।

विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के अध्यक्ष राकेश रंजन महतो ने इस मामले पर सवाल उठाते हुए कहा कि शहीदों के बलिदान को याद करना तभी सार्थक होगा, जब उनके परिवारों को सम्मान के साथ उनका हक भी मिले।

श्रद्धांजलि के साथ हक भी जरूरी

राकेश रंजन महतो ने कहा कि शहादत दिवस पर श्रद्धांजलि देने और मंचों से बड़े-बड़े भाषण देने वाले नेताओं को यह भी बताना चाहिए कि शहीदों के परिवारों से किए गए वादे आज तक अधूरे क्यों हैं।

उन्होंने याद दिलाया कि 21 अक्टूबर 1982 को तत्कालीन ईचागढ़ प्रखंड मुख्यालय, तिरुलडीह में क्षेत्र को सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन किया जा रहा था। इसी दौरान पुलिस फायरिंग में अजीत महतो और धनंजय महतो की जान चली गई।

2007 से 2009 तक मिले आश्वासन, 2026 तक अधूरे

राकेश रंजन महतो ने बताया कि शहीद धनंजय महतो की पत्नी बारी देवी और उनके पुत्र उपेन महतो को नौकरी सहित अन्य सुविधाएं देने के आश्वासन दिए गए थे। परिवार के अनुसार, वर्ष 2007 में तत्कालीन मंत्री बंधु तिर्की ने मुलाकात की थी, जबकि वर्ष 2009 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने शहादत दिवस के अवसर पर नौकरी देने का आश्वासन दिया था। इसके बावजूद परिवार को अब तक सरकारी नौकरी नहीं मिल सकी है।

उन्होंने कहा कि पूर्व आजसू नेता और वर्तमान भाजपा नेता हरेलाल महतो ने शहीद के परिवार के लिए मकान बनवाया और उनके पुत्र उपेन महतो को अपने यहां काम दिया। यह सहयोग सराहनीय है, लेकिन सरकारी स्तर पर किए गए वादों और जिम्मेदारियों का सवाल अपनी जगह कायम है।

“राजनीति आसान, हक दिलाना असली जिम्मेदारी”

राकेश रंजन महतो ने कहा, “शहीदों के नाम पर राजनीति करना आसान है, लेकिन उनके परिवारों को उनका हक दिलाना असली जिम्मेदारी है। अगर सरकार ने नौकरी देने का आश्वासन दिया था, तो 44 साल बाद भी परिवार इंतजार क्यों कर रहा है? सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि यह मामला कहां अटका हुआ है और शहीद के परिवार को न्याय कब मिलेगा।”

उन्होंने कहा कि हर वर्ष शहादत दिवस पर श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित होती हैं, लेकिन शहीदों के परिवारों की समस्याओं पर ठोस कार्रवाई भी होनी चाहिए। 44 साल का इंतजार अपने आप में गंभीर सवाल है। अब जरूरत नए आश्वासनों की नहीं, बल्कि जवाबदेही और ठोस कार्रवाई की है।

तिरुलडीह गोलीकांड का इतिहास झारखंड आंदोलन में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार इस घटना के बाद पूरे क्षेत्र में अलग राज्य की मांग और भी तेज हो गई थी। शहीद अजीत महतो और शहीद धनंजय महतो की शहादत को आज भी लोग गर्व और पीड़ा दोनों के साथ याद करते हैं।

हर साल 21 अक्टूबर को तिरुलडीह में शहादत दिवस मनाया जाता है। बड़े-बड़े नेता मंच पर आते हैं, शहीदों की तस्वीरों पर माल्यार्पण करते हैं और भाषण देते हैं। लेकिन स्थानीय लोगों का सवाल है कि जब मंच से सम्मान दिया जाता है, तो परिवार को उसका हक क्यों नहीं दिया जाता।

विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के अध्यक्ष राकेश रंजन महतो ने कहा कि बारी देवी और उनके बेटे उपेन महतो आज भी संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि 2007 और 2009 में जो आश्वासन दिए गए थे, सरकार को उनके रिकॉर्ड निकालकर देखना चाहिए और बताना चाहिए कि मामला कहाँ अटका है।

स्थानीय ग्रामीणों का भी कहना है कि सरकार को अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस निर्णय लेना चाहिए। अगर एक शहीद के परिवार को 44 साल तक इंतजार करना पड़े, तो यह पूरे सिस्टम पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

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