Dr Satyanarayan Murmu Junior Raghunath Ol Chiki के प्रचार-प्रसार में लगातार जुटे हुए हैं। चांडिल में संथाली भाषा और ओल चिकी लिपि के संरक्षण के लिए उनके समर्पण ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई है। आदिवासी संथाली समाज के बीच भाषा और लिपि के संरक्षण के लिए लंबे समय से सक्रिय डॉ. मुर्मू को लोग प्यार और सम्मान से ‘जूनियर रघुनाथ’ कहकर पुकारते हैं। उन्हें ओल चिकी लिपि के जनक पंडित रघुनाथ मुर्मू के विचारों और मिशन को आगे बढ़ाने वाला व्यक्ति माना जाता है।
भाषा ही समाज की पहचान है: डॉ. मुर्मू
डॉ. मुर्मू का मानना है कि किसी भी समाज की पहचान उसकी भाषा, लिपि और संस्कृति से होती है। इसी सोच के साथ वे लगातार संथाली समाज के बीच ओल चिकी के पठन-पाठन को प्रोत्साहित कर रहे हैं। उनका कहना है कि अगर भाषा खत्म हो गई तो समाज की संस्कृति और इतिहास भी धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा। इसलिए नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा से जोड़ना सबसे जरूरी है।
इसके लिए वे एसएन ट्रॉफी के माध्यम से विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। इस ट्रॉफी के तहत वे गांव-गांव जाकर बच्चों और युवाओं में ओल चिकी के प्रति जागरूकता फैलाते हैं। विद्यार्थियों में ओल चिकी के प्रति रुचि बढ़ाने के उद्देश्य से परीक्षाएं भी आयोजित की जाती हैं। इन परीक्षाओं में सफल होने वाले प्रतिभागियों को विशेष पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाता है, ताकि उनमें भाषा सीखने और आगे बढ़ने का उत्साह बना रहे।
झारखंड से बाहर भी हो रही है चर्चा
उनके इन प्रयासों की चर्चा अब केवल झारखंड तक सीमित नहीं है, बल्कि पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम जैसे राज्यों में भी हो रही है, जहां संथाली समाज के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। संथाली समाज के लोगों का मानना है कि मातृभाषा और ओल चिकी लिपि को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में डॉ. मुर्मू की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। कई युवा अब उनके प्रेरणा से ओल चिकी सीखने लगे हैं।
लोग उन्हें ‘जूनियर रघुनाथ’ इसलिए कहते हैं क्योंकि जिस तरह पंडित रघुनाथ मुर्मू ने ओल चिकी लिपि का आविष्कार करके संथाली समाज को एक नई दिशा दी थी, उसी तरह डॉ. सत्यनारायण मुर्मू आज उस लिपि को घर-घर तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं। यह उपाधि सम्मान के साथ-साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी है, जिसे वे बखूबी निभा रहे हैं।
चांडिल डैम में उठी बड़ी मांग
हाल ही में चांडिल डैम में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में सरकारी विद्यालयों में ओल चिकी लिपि के माध्यम से संथाली भाषा की पढ़ाई शुरू कराने तथा योग्य ओल चिकी शिक्षकों की शीघ्र नियुक्ति की मांग उठाई गई। इस बैठक में संथाली समाज के कई बुद्धिजीवी, शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए थे।
डॉ. मुर्मू ने भी इस मांग का पुरजोर समर्थन करते हुए इसे संथाली भाषा के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि जब तक सरकारी स्कूलों में ओल चिकी से पढ़ाई शुरू नहीं होगी, तब तक भाषा का विकास संभव नहीं है। बच्चों को अपनी भाषा में शिक्षा मिलने से वे बेहतर तरीके से समझ पाएंगे। इस संबंध में जल्द ही सरायकेला-खरसावां जिला उपायुक्त को ज्ञापन सौंपने की तैयारी की जा रही है।
नई पीढ़ी को जोड़ने की मुहिम
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि डॉ. मुर्मू जैसे भाषा प्रेमियों के प्रयासों से ही नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा, लिपि और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी रहेगी। आज के समय में जब अंग्रेजी और हिंदी का प्रभाव बढ़ रहा है, ऐसे में अपनी भाषा को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती है। लेकिन डॉ. मुर्मू का प्रयास इस चुनौती को आसान बना रहा है।
उनका अभियान सिर्फ पढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे संथाली संस्कृति, रीति-रिवाज और इतिहास को भी लोगों तक पहुंचा रहे हैं। उनका सपना है कि आने वाले समय में हर संथाली परिवार में ओल चिकी में लिखी किताबें हों और बच्चे गर्व से अपनी भाषा बोलें।
निष्कर्ष: डॉ. सत्यनारायण मुर्मू का यह कार्य निश्चित रूप से सराहनीय है। उन्हें ‘जूनियर रघुनाथ’ कहना संथाली समाज का उनके प्रति सम्मान और विश्वास को दर्शाता है। उनके प्रयासों से ओल चिकी लिपि का भविष्य उज्ज्वल दिख रहा है।

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