ताजा खबरों के लिए हमें फॉलो करें

Facebook Page Follow करें
BREAKINGपुरुलिया में BJMTUC की नई जिला कमेटी घोषित, विश्वजीत दे बने अध्यक्ष, 40 पदाधिकारियों के नामों का ऐलान | कालीपूजा से पहले पुलिस की बड़ी कार्रवाई, स्कूटी से 4.6 लीटर प्रतिबंधित फेंसिडिल बरामद, एक गिरफ्तार | जामडीह आरओबी का इंतजार होगा खत्म, 14 नवंबर को उद्घाटन की तैयारी तेज | कालीपूजा के चंदे की आड़ में गुंडागर्दी, विरोध करने पर दो सिविक वॉलंटियर पर जानलेवा हमला, तीन गिरफ्तार | एनएच-18 पर अवैध गिट्टी परिवहन का भंडाफोड़, ओवरलोड हाइवा जब्त | चांडिल डैम को पर्यटन के बड़े केंद्र के रूप में विकसित करने की तैयारी, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने दिए निर्देश | जिम्नास्टिक में पुरुलिया की ऐतिहासिक छलांग, 11 वर्षीय अंचिता ने राज्यस्तरीय प्रतियोगिता में जीते दो कांस्य पदक | ओल चिकी के प्रचार-प्रसार में जुटे डॉ. सत्यनारायण मुर्मू, लोग प्यार से कहते हैं 'जूनियर रघुनाथ' |

महादशमी के बाद भी आठ दिन तक बेटी बनाकर रखते हैं मां दुर्गा को, पुरुलिया के सेन परिवार की 259 साल पुरानी परंपरा

Purulia Sen Family Durga Puja की 259 साल पुरानी परंपरा आज भी मधुपुर गांव में निभाई जा रही है।

▫️अष्टमंगला के बाद ही होती है प्रतिमा की विदाई, मधुपुर गांव में आज भी निभाई जा रही अनूठी परंपरा

मानबाजार (पुरुलिया) : मां दुर्गा केवल देवी नहीं, बल्कि घर की बेटी भी हैं। यही भावना पुरुलिया जिले के मानबाजार प्रखंड के मधुपुर गांव में सेन परिवार की 259 साल पुरानी दुर्गापूजा की अनूठी परंपरा में झलकती है। यहां विजयादशमी के दिन मां को विदा नहीं किया जाता, बल्कि बेटी की तरह आठ दिनों तक घर में रोककर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। अष्टमंगला की रस्म पूरी होने के बाद ही मां की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।

Purulia Madhupur Sen Family 259 Years Durga Puja Visarjan

मानबाजार-1 प्रखंड की बिशरी ग्राम पंचायत अंतर्गत मधुपुर गांव में सेन परिवार की दुर्गापूजा में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। परिवार के सदस्यों का मानना है कि जिस तरह विवाह के बाद बेटी अष्टमंगला पर मायके लौटती है, उसी तरह मां उमा को भी दशमी के तुरंत बाद विदा करना उचित नहीं है। इसलिए विजयादशमी के बाद अगले आठ दिनों तक मां की पूजा, आरती और भोग का सिलसिला जारी रहता है।

इस साल सम तारीख के कारण टला विसर्जन

इस वर्ष भी परंपरा का पूरी श्रद्धा के साथ पालन किया गया। 21 अक्टूबर को विजयादशमी के बाद 30 अक्टूबर को विसर्जन की तिथि निर्धारित थी। लेकिन शुक्रवार को सम तारीख होने के कारण प्रतिमा का विसर्जन नहीं किया गया। परिवार की परंपरा के अनुसार अष्टमंगला के बाद भी यदि सम तारीख पड़ती है तो विसर्जन नहीं होता। इसके लिए अगले विषम दिन का इंतजार किया जाता है। अंततः शनिवार को गांव के बड़े तालाब में मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया गया।

विसर्जन के दिन भी घर में उत्सव का माहौल रहा। महिलाओं ने दशमी की तरह सिंदूर खेला में हिस्सा लिया। मां को सिंदूर लगाकर और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ विदाई दी गई। ढाक की गूंज के बीच परिवार के सदस्यों ने नम आंखों से मां को विदा किया। हालांकि नवपत्रिका का विसर्जन विजयादशमी के दिन ही कर दिया गया था, लेकिन प्रतिमा विसर्जन से एक दिन पहले तक मां की पूजा-अर्चना जारी रही।

परिवार ने कहा – मां बेटी के समान हैं

परिवार के सदस्य प्रणव कुमार सेन ने बताया कि उनकी पूजा में अष्टमंगला के बाद ही मां को विदा करने का विधान है। मां उनके लिए परिवार की बेटी के समान हैं। इसी भावना से यह परंपरा निभाई जाती है। अष्टमंगला के बाद यदि सम तारीख पड़ती है तो उस दिन विसर्जन नहीं किया जाता, बल्कि अगले विषम दिन प्रतिमा का विसर्जन होता है। यह नियम उनके पूर्वजों ने बनाया था और आज भी इसका सख्ती से पालन किया जाता है।

मधुपुर गांव में दो अनोखी परंपराएं

मधुपुर गांव में दुर्गापूजा की एक और खास परंपरा है। यहां घोष परिवार की दुर्गाप्रतिमा का विसर्जन कालीपूजा के बाद किया जाता है। इस तरह सेन परिवार की अष्टमंगला परंपरा और घोष परिवार की लंबी चलने वाली पूजा के कारण गांव में दुर्गोत्सव का उल्लास कई दिनों तक बना रहता है।

259 साल पुरानी यह परंपरा आज भी इस बात का एहसास कराती है कि बंगाल में मां दुर्गा सिर्फ आराध्य देवी नहीं, बल्कि घर की अपनी बेटी भी हैं। बंगाल की संस्कृति में बेटी के रूप में मां दुर्गा को देखना आम है। कहा जाता है कि मां उमा साल में एक बार अपने मायके यानी धरती पर आती हैं और विजयादशमी के दिन उनकी विदाई होती है। लेकिन सेन परिवार इस विदाई को थोड़ा और टाल देता है, ताकि बेटी कुछ दिन और मायके में रह सके।

स्थानीय लोगों का कहना है कि सेन परिवार की इस पूजा को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। अष्टमंगला के बाद भी जब गांव के अन्य जगहों पर पंडाल सूने हो जाते हैं, तब सेन परिवार के घर में ढाक-ढोल और शंख की आवाज गूंजती रहती है। यह परंपरा न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि परिवार और समाज के बीच बेटी के सम्मान को भी दर्शाती है।

निष्कर्ष: पुरुलिया के मानबाजार के मधुपुर गांव में निभाई जा रही सेन परिवार की यह 259 साल पुरानी परंपरा आज के आधुनिक दौर में भी अपनी जड़ों से जुड़े रहने की सीख देती है। यह बताती है कि आस्था केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि भावना और परिवारिक प्रेम से भी जुड़ी होती है।


 

🟢 WhatsApp Share
Spread the love

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top