Jamdih Chhau Training Shantiniketan — झारखंड की सांस्कृतिक पहचान यूनेस्को मान्यता प्राप्त छऊ नृत्य की गूंज अब बंगाल तक पहुंच गई है। सरायकेला-खरसावां जिले के प्रसिद्ध कलाकार गांव जमडीह के अंतरराष्ट्रीय कलाकारों ने पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन में बालिकाओं को छऊ नृत्य का प्रशिक्षण देकर एक शानदार पहल की है।
जमडीह के अंतरराष्ट्रीय कलाकारों की एक और शानदार पहल! शांतिनिकेतन में बालिकाओं को सिखा रहे हैं छऊ नृत्य
चांडिल / सरायकेला-खरसावां: झारखंड की मिट्टी की पहचान और यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त विश्व प्रसिद्ध छऊ नृत्य की गूंज अब बंगाल की सांस्कृतिक धरती शांतिनिकेतन तक पहुँच गई है। सरायकेला-खरसावां जिले के प्रसिद्ध कलाकार गांव जमडीह के अंतरराष्ट्रीय छऊ कलाकारों ने एक बार फिर अपनी कला और संस्कृति प्रेम का परिचय देते हुए पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन में बालिकाओं को छऊ नृत्य का प्रशिक्षण देना शुरू किया है।
यह पहल न केवल झारखंड के लिए गर्व की बात है, बल्कि हमारी लुप्त होती लोक कलाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की एक सच्ची साधना भी है।
शांतिनिकेतन में गूंजा मांदल और छऊ के घुंघरू
प्राप्त जानकारी के अनुसार, जमडीह गांव के वरिष्ठ और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त छऊ कलाकारों की एक टीम इन दिनों पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले स्थित शांतिनिकेतन में है। वहाँ विश्व-भारती विश्वविद्यालय परिसर और आसपास के सांस्कृतिक केंद्रों में स्थानीय बालिकाओं और युवतियों को छऊ नृत्य की बारीकियां सिखाई जा रही हैं।
कलाकारों ने बताया कि शांतिनिकेतन, जो खुद गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की कर्मभूमि है और कला-साधना का केंद्र माना जाता है, वहां की बच्चियों में छऊ के प्रति अद्भुत उत्साह देखने को मिल रहा है। सुबह से शाम तक ढोल, धमसा, मांदल की थाप पर बालिकाएं छऊ के कठिन स्टेप्स, चौक-चाल और पशु-पक्षियों की भाव-भंगिमाओं को सीख रही हैं।
हमारी संस्कृति, हमारी पहचान
छऊ नृत्य सिर्फ एक नृत्य नहीं, बल्कि यह शक्ति, भक्ति और युद्ध कला का संगम है। सदियों से सरायकेला राजपरिवार द्वारा संरक्षित यह नृत्य आज अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंच चुका है। लेकिन चिंता की बात यह है कि नई पीढ़ी धीरे-धीरे इससे दूर हो रही है। ऐसे में जमडीह के कलाकारों की यह पहल बेहद सराहनीय है।
जमडीह गांव को छऊ कलाकारों की खान कहा जाता है। यहां के हर घर में एक छऊ कलाकार है। इस गांव के कलाकार अमेरिका, जापान, फ्रांस, इंग्लैंड सहित कई देशों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। अब उसी मिट्टी के लाल अपनी कला को बंगाल की बेटियों तक पहुंचा रहे हैं, यह दर्शाता है कि कला की कोई सीमा नहीं होती।
एक प्रशिक्षक कलाकार ने बताया, “हमारा उद्देश्य सिर्फ नृत्य सिखाना नहीं है, बल्कि हमारी संस्कृति को जीवित रखना है। जब ये बालिकाएं छऊ सीखेंगी, तो झारखंड और बंगाल की सांस्कृतिक दूरी और कम होगी। हमारी पहचान तभी बची रहेगी जब अगली पीढ़ी इसे अपनाएगी।”
बालिकाओं में दिखा गजब का उत्साह
शांतिनिकेतन में प्रशिक्षण ले रही बालिकाओं ने भी इस अनुभव को अविस्मरणीय बताया। पहले वे छऊ को केवल पुरुषों का नृत्य मानती थीं, लेकिन अब वे खुद मुखौटा पहनकर महिषासुर मर्दिनी, दुर्गा और मयूर नृत्य की प्रस्तुति करना सीख रही हैं। इससे महिला सशक्तिकरण का एक नया संदेश भी जा रहा है।
स्थानीय आयोजकों ने जमडीह के कलाकारों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि शांतिनिकेतन में छऊ की कार्यशाला लगना हमारे लिए सौभाग्य की बात है। इससे यहां के छात्रों को भारत की एक प्राचीन युद्ध-कला आधारित नृत्य शैली को करीब से जानने का मौका मिल रहा है।
निश्चित रूप से, जमडीह के इन अंतरराष्ट्रीय कलाकारों ने यह साबित कर दिया है कि अगर नीयत में अपनी संस्कृति के प्रति सच्चा प्रेम हो, तो कला खुद-ब-खुद सीमाएं लांघ जाती है। Janta Ki Awaaz Live की ओर से इस पूरी टीम को दिल से सलाम🫡
जनता की आवाज़ लाइव की यह खबर, जमडीह छऊ ट्रेनिंग शांतिनिकेतन को लेकर आपको कैसी लगी, कमेंट में ज़रूर बताएं।

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