bandna parv raghunathpur haat – नीमडीह: झारखंड की लोक संस्कृति का प्रतीक बांदना पर्व नजदीक आते ही गांवों में उत्सव का माहौल बन गया है।
बांदना पर्व की आहट से गुलजार हुआ रघुनाथपुर हाट, खरीदारी को उमड़ी भीड़
- ▫️ पशुधन की पूजा-अर्चना के लिए ग्रामीणों ने खरीदी पूजन सामग्री, मुर्गों की दुकानों पर रही विशेष भीड़
नीमडीह : झारखंड की लोक संस्कृति और ग्रामीण परंपरा का प्रतीक तीन दिवसीय बांदना पर्व (सोहराय) नजदीक आते ही गांवों में उत्सव का माहौल बनने लगा है। पर्व की तैयारियों को लेकर शनिवार को नीमडीह प्रखंड के रघुनाथपुर हाट में खरीदारों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। सुबह से ही आसपास के गांवों से महिला-पुरुष बड़ी संख्या में हाट पहुंचे। पर्व की जरूरतों के अनुसार खरीदारी को लेकर बाजार में दिनभर चहल-पहल बनी रही।
bandna parv raghunathpur haat – बांदना पर्व का महत्व क्या है?
बांदना पर्व झारखंड के ग्रामीण समाज में विशेष महत्व रखता है। यह त्योहार मुख्य रूप से पशुधन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने और उनकी सुख-समृद्धि की कामना के लिए मनाया जाता है। कालीपूजा के अगले दिन से शुरू होने वाले इस तीन दिवसीय उत्सव में गाय, बैल सहित अन्य पालतू पशुओं की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। ग्रामीण इस दौरान अपने घरों और पशुशालाओं की साफ-सफाई कर उन्हें सजाते हैं। साथ ही प्राकृतिक रंगों से अल्पना और पारंपरिक चित्रकारी कर उत्सव की खुशियां मनाते हैं। यह पर्व बताता है कि किसान और पशु एक दूसरे के पूरक हैं। मान्यता है कि इस पर्व में पशुओं की पूजा करने से पूरे साल घर में धन-धान्य बना रहता है।
रघुनाथपुर हाट में मुर्गों की दुकानों पर क्यों रही भीड़?
पर्व के दौरान अलग-अलग दिनों में कई पारंपरिक अनुष्ठान किए जाते हैं। ग्रामीण रीति-रिवाज के अनुसार कुछ क्षेत्रों में खलिहान में मुर्गे की बलि देने की भी परंपरा है। इस कारण शनिवार को रघुनाथपुर हाट में मुर्गों की खरीदारी के लिए विशेष भीड़ देखने को मिली। इसके अलावा पूजा में इस्तेमाल होने वाली अन्य सामग्री जैसे सिंदूर, सरसों तेल, नया धान, मिट्टी के दीये, रंग-बिरंगे धागे और पशुओं को सजाने के लिए माला और घरेलू जरूरतों की वस्तुओं की भी लोगों ने जमकर खरीदारी की। महिलाओं ने घर सजाने के लिए चौक मिट्टी और प्राकृतिक रंगों की भी खरीदारी की।
दुकानदारों के खिले चेहरे, गांवों में उत्सव का माहौल
हाट में उमड़ी भीड़ से दुकानदारों के चेहरे भी खिले नजर आए। एक दुकानदार ने बताया कि इस बार बांदना को लेकर बाजार में पिछले साल से ज्यादा रौनक है। लोगों के पास पर्व मनाने के लिए पैसा भी है और उत्साह भी। ग्रामीणों का कहना है कि बांदना पर्व केवल पशुधन की पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, कृषि और ग्रामीण जीवन के बीच गहरे संबंध को दर्शाने वाला सांस्कृतिक उत्सव है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि मनुष्य और पशु एक-दूसरे के पूरक हैं। पर्व को लेकर गांवों में अभी से उत्साह और उल्लास का माहौल है, बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक सभी इसकी तैयारियों में जुटे हैं।
ग्रामीणों में खुशी: bandna parv raghunathpur haat में आए किसान रामदयाल महतो ने बताया कि बांदना हमारा सबसे बड़ा पर्व है। इस दिन हम अपने बैल और गाय को अपने बच्चे की तरह सजाते हैं। उनके बिना हमारी खेती अधूरी है। महिला सुनीता देवी ने कहा कि हमने घर की लिपाई के लिए चौक मिट्टी और रंग खरीदे हैं। अब कल से घर सजाने का काम शुरू होगा। इस बार हाट में पिछले साल से ज्यादा रौनक है।
बांदना पर्व झारखंड की संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है, इसके बारे में विस्तार से जानने के लिए Wikipedia पर सोहराय पर्व की जानकारी पढ़ सकते हैं।
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रिपोर्ट – जनता की आवाज लाइव, नीमडीह / रघुनाथपुर

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